डूबता भारत, सुलगता भारत: नशे की गिरफ्त में युवा पीढ़ी
प्रस्तावना
स्वतंत्र भारत ने बीते 75 वर्षों में अनेक क्षेत्रों में अद्भुत उपलब्धियाँ हासिल की हैं—चाहे वह विज्ञान हो, शिक्षा हो, कला हो या खेल। एक ओर भारत वैश्विक पटल पर अपनी विजय पताका लहरा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ सामाजिक विकृतियाँ देश को भीतर से खोखला कर रही हैं। इन विकृतियों में जातिवाद, भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता और सबसे चिंताजनक—नशे की बढ़ती प्रवृत्ति—भारत के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है।
इतिहास और वर्तमान का दर्पण
नशा कोई आधुनिक बुराई नहीं है। प्राचीन काल में भी मदिरा और अन्य मादक द्रव्यों का प्रयोग राजाओं और सामंतों में प्रचलित था। वेदों में ‘सोम’ और ‘सुरा’ जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है, जो दर्शाते हैं कि मादक पदार्थों का प्रयोग सामाजिक परिपाटी का हिस्सा रहा है। परंतु वर्तमान समय में नशे का स्वरूप और प्रभाव दोनों ही अधिक व्यापक और विध्वंसक हो चुके हैं।
आज का युवा, जिसे देश की रीढ़ कहा जाता है, नशे की गिरफ्त में इस प्रकार आ चुका है जैसे वह अपने देश, अपने परिवार और स्वयं के प्रति उत्तरदायित्वहीन हो गया हो। पहले की अपेक्षा अब नशे के प्रकार कहीं अधिक खतरनाक और विविध हो गए हैं—हीरोइन, कोकीन, LSD, क्रिस्टल मेथ, शराब, सिगरेट, ई-सिगरेट, गांजा, अफीम इत्यादि। युवा अपने रक्त में ज़हर और सांसों में धुआँ भर रहा है, मानो उसने प्रकृति की शुद्ध वायु और जल को त्याग कर स्वयं अपने अंत का चयन कर लिया हो।
नशे के कारण
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि आखिर युवा नशे की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं?
मुख्यतः इसके दो प्रमुख कारण उभर कर आते हैं:
- मानसिक तनाव और चिंता:
आज की तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धी दुनिया में व्यक्ति अकसर मानसिक तनाव, असफलताओं, अवसाद और अकेलेपन से जूझता है। ऐसे में कुछ लोग नशे को तनाव से मुक्ति का साधन मानकर इसका सेवन प्रारंभ कर देते हैं। प्रारंभ में यह मात्रा कम होती है, परंतु धीरे-धीरे यह लत बन जाती है। - संगति का प्रभाव:
जैसा कि कहा गया है—”संग का रंग चढ़ता है”। यदि कोई व्यक्ति नशे का आदी लोगों के संपर्क में आता है, तो वह भी उसी दिशा में बह जाता है। विशेषकर युवाओं के लिए दोस्ती का प्रभाव अत्यंत गहरा होता है, और इसी प्रभाव में वे नशे के दलदल में उतर जाते हैं।
नशे के दुष्परिणाम
नशा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक सभी पक्षों को प्रभावित करता है:
- शारीरिक रूप से वह रोगों से ग्रसित हो जाता है—जैसे लीवर की खराबी, फेफड़ों की समस्याएं, दिल के रोग, और मस्तिष्क संबंधी विकार।
- मानसिक रूप से उसका आत्मबल, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता समाप्त हो जाती है।
- सामाजिक दृष्टि से वह अपमान, अलगाव और तिरस्कार का पात्र बनता है।
- आर्थिक रूप से वह अपने संसाधन नष्ट करता है और अपराध की ओर अग्रसर हो सकता है।
नशे के कारण परिवारों में कलह, समाज में अस्थिरता और राष्ट्र की उत्पादकता में गिरावट आती है। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षरण का विषय है।
समाधान की ओर दृष्टि
यदि समस्या विकराल है, तो समाधान भी संभव है। इसके लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं:
- परिवार और विद्यालय—बच्चों में नैतिक शिक्षा, तनाव प्रबंधन और सकारात्मक सोच को बढ़ावा दें।
- सरकार—नशे के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए कठोर कानूनों का क्रियान्वयन, पुनर्वास केंद्रों की स्थापना और जनजागरूकता अभियान चलाए।
- मीडिया और सिनेमा—नशे को ग्लैमराइज करने की बजाय इसके दुष्परिणामों को दर्शाएं।
- युवाओं के लिए वैकल्पिक ऊर्जा-निर्गम—खेल, संगीत, कला, योग जैसे क्षेत्र युवाओं को सार्थक दिशा प्रदान कर सकते हैं।
निष्कर्ष
नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र को गर्त में धकेल सकता है। यदि भारत को एक समर्थ, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना है, तो सबसे पहले अपने युवाओं को नशे की आग से बचाना होगा।
हमें वह नशा चाहिए—प्रेम का, परिश्रम का, और राष्ट्र निर्माण के संकल्प का।
क्योंकि सच्चा नशा वही है जो व्यक्ति को सृजन की ओर ले जाए, विनाश की ओर नहीं।